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चुनावी - रंग

Posted On: 7 May, 2014 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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चुनावी – रंग

फिर आया चुनाव – फिर हुआ चुनाव,
चुनावी रंग में रंग में रंगा शहर और गॉंव ।
जनता फासने को नेता चले नये दांव ,
डूबे न इनकी मजधार में नाव ।।
******
फूलों से भी जिनके छिल जाते पांव ,
खि‍न्न होते देख निरिह जनता के घाव ।
मरहम करने निकले वही- लिए प्रेम का भाव ,
अब उन्हें न घूप लगती न छांव ।।
*******
हर गली हर चौराहे पर डाले पड़ाव ,
जनता की सेवा में दिखाते बड़ी चाव ।
मिथ्या वादों की फिर वहीं कांव – कांव ,
‘देश में लाएंगे नया बदलाव’ ।।
*******
कुर्सी पाते ही बदल जाता बर्ताव,
जन-सेवा से निज-सेवा में होता झुकाव ।
देश में फैला जाति -धर्म-अलगाव ,
अपनी कुर्सी का करते बचाव ।।
******
—————————————
उदयराज़

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

udayraj के द्वारा
May 8, 2014

आशा है आप सब को मेरी यह छोटी कविता पसंद आएगी । हर बार की तरह इस बार भी देश में फिर से चुनावी रंग छाया हुआ है । वादे पर वादे हो रहे हैं । इसी संदर्भ में प्रस्तुत है मेरा लघु प्रयास ।


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